Friday, February 25, 2011

सदनों में सिमटता कामकाज


हंगामे और शोर-शराबे के कारण विधायी सदनों का महत्व घटता देख रहे हैं लेखक
जनतंत्र और विधायिका पर्यायवाची हैं। संसदीय व्यवस्था की जननी कही जाने वाली ब्रिटिश संसद भी आत्म रूपांतरण कर रही है। ब्रिटिश संसद में संसद की पांच वर्ष की अवधि पुख्ता करने वाला विधेयक हाल ही में आया है। अमेरिकी कांग्रेस और सीनेट भी बेहतर संवाद की ओर प्रयत्नशील हैं। भारतीय संविधान में संसद और विधानमंडल ही आमजनों के भाग्य विधाता है। सरकारें इनकी अनुमति के बिना कोई टैक्स नहीं लगा सकतीं और न ही खर्च कर सकती हैं। बजट पर बहस, कटौती प्रस्ताव और विनियोग विधेयक आदि के जरिए संसद और विधानमंडल सरकारी खर्चो को नियंत्रित करते हैं। कानून बनाने के समय होने वाली बहस नए विधेयकों के उद्देश्य और कारण का सारयुक्त विश्लेषण होती है। बावजूद इसके देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की विधानसभा में 1,87000 हजार करोड़ से ज्यादा का बजट 14 मिनट में ही पारित हो गया। बेशक ऐसा कुछ पहले भी कई राज्यों में हुआ था, लेकिन यह ऐतिहासिक था। 24 दिन का काम 7 दिन में, बहस, न तर्क, न प्रतितर्क। संविधान की मूल भावना और नियमावली तार-तार हो गई। जेपीसी की मांग पर केंद्र केअडि़यल रुख के चलते संसद का बीता सत्र भी पूरे 22 दिन गतिरोध में रहा। विधानमंडलों में हंगामे के बीच बजट और विधायी कार्य फौरन निपटाने की चिंताजनक प्रवृत्ति बढ़ी है। संसद और विधानमंडल आमजन के सुख-दुख केप्रतिनिधि मंच नहीं रहे। यहां रोजी-रोजगार, गरीबी और अभाव पर चर्चा के अवसर नहीं हैं। विधि निर्माण जैसा संवेदनशील काम भी हंगामों के बीच निपटाया जा रहा है। कानून आमजन को प्रभावित करते हैं। उत्तर प्रदेश के नगरीय क्षेत्रों के निवासी अपने निकायों के अध्यक्ष/मेयर चुनने से वंचित किए गए हैं। सामान्य मताधिकार छीनने वाले इस विधेयक पर सम्यक चर्चा की जरूरत थी। यह और ऐसे ही तमाम कानून हंगामे के बीच पारित हो रहे हैं। अन्य तमाम राच्यों में भी ऐसा ही हो रहा है। बजट प्रस्ताव आम नागरिक के जीवन में हस्तक्षेप करते हैं। संविधान निर्माताओं ने इन प्रस्तावों पर विधायी संस्थाओं का बंधन लगाया था। बुनियादी सवाल यह है कि सदन में बिना बहस, विचार विमर्श के ही घोर अव्यवस्था के बीच पारित बजट और विधेयकों का औचित्य क्या है? शोर-शराबे के बीच पारित ऐसे प्रावधान आम जनता पर क्यों बाध्यकारी हैं? संसद और विधानमंडलों को अपनी कार्यवाही की वैधता का निर्णय करने का भी अनन्य अधिकार है। संविधान (अनु. 122) में संसद की किसी कार्यवाही को प्रक्रिया की किसी अनियमितता के आधार पर प्रश्नगत न करने के प्रावधान हैं। यही शक्ति विधानमंडल की कार्यवाही के बारे में (अनु. 212) भी हैं। इलाहाबाद, कलकत्ता और हैदराबाद के उच्च न्यायालयों ने अलग-अलग मामलों में इसी सिद्धांत पर मुहर लगाई है, लेकिन केरल हाईकोर्ट की पूर्णपीठ ने 1983 में कहा था कि अनु. 212 की छूट अनियमित प्रक्रिया की शिकायत तक ही सीमित है। यदि कार्यवाही को असंवैधानिक बताते हुए चुनौती दी जाए तो ऐसी कार्यवाही की न्यायालय द्वारा समीक्षा की जा सकती है। हंगामे के बीच बने अधिनियम और पारित बजट भले ही प्रक्रियागत छूट के कारण वैध हों, लेकिन उन्हें संवैधानिक नहीं माना जा सकता। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राजनारायण बनाम आत्माराम गोविंदखेर वाद (1954) में एक टिप्पणी की थी कि यह न्यायालय अध्यक्ष के निर्णय के विरुद्ध अपील या पुनरीक्षण का न्यायालय नहीं है, अध्यक्ष पर ही सभा की प्रतिष्ठा तथा गरिमा की जिम्मेदारी है। यहां प्रकारांतर से पीठासीन अध्यक्षों को अनियमितता के प्रति सजग रहने के सुझाव है। महाभारत सभापर्व में कहा गया कि सभा में किए गए पाप का आधा पाप सभाध्यक्ष पर, एक चौथाई मौन सभा सदस्यों पर और बाकी एक चौथाई पाप करने वालों पर लगता है। ताजा स्थितियों में सत्तारूढ़ दलों के हाईकमान ही दोषी हैं। संसद और विधानमंडलों की बैठकें घटी हैं। कार्य के घंटे भी घटे हैं। लोकसभा सचिवालय द्वारा प्रकाशित संसदीय पद्धति और प्रक्रिया में कहा गया है कि सामान्यतया एक वर्ष में सभा के तीन सत्र होते हैं, जो लगभग 23 से 24 सप्ताह तक चलते हैं। एक वर्ष में सभा की औसतन 120 बैठकें होती हैं। विधानमंडलों की नियमावली में भी सामान्यतया 90 दिन की बैठकों का उल्लेख है। युद्ध, आपातस्थिति, गृहयुद्ध या संबंधित राच्य में अनियंत्रित उपद्रवों के समय बैठकें न करना ठीक हो सता है। बाकी सब सामान्य है। मूलभूत प्रश्न यह है कि बैठकें क्यों नहीं होतीं? संसदीय परंपरा में लगातार गिरावट है। पहली लोकसभा में 61 प्रतिशत प्रश्नों के उत्तर दिए गए थे, दूसरी में 47 व तीसरी से 8वीं तक यह प्रतिशत औसतन 36 रहा, 12वीं में घटकर 21 हो गया। 10वीं लोकसभा ने शोर शराबे पर 10 प्रतिशत समय गंवाया तो 12वीं ने 11 प्रतिशत। वर्तमान लोकसभा ने शीत सत्र में ही 22 दिन गवाएं हैं। विधानमंडलों की हालत और भी खराब है। संसद और विधानमंडलों के अधिष्ठान व कार्यवाही संचालन पर अरबों रुपये का खर्च होता है। बैठकों के अभाव में आखिरकार इनका औचित्य क्या है? वाद विवाद और संवाद आधारित संसदीय प्रणाली आदर्श जीवन पद्धति का भी निर्माण करती है। कलह, संघर्ष और घोटालों, गड़बड़झालों को ढोते हुए चलने वाली संसदीय प्रणाली शुभ नहीं होती, लेकिन गलती ठीक करने की दिशा में संलग्न संसद ही संसद का विकल्प होती है। संसद और विधानमंडल अकूत शक्ति से लैस है। गलतियां बहुत हो गईं। संसद और विधानमंडल में आत्म रूपांतरण की ऊर्जा का अक्षय भंडार है। संसद और विधानमंडल जीवंत आदरणीय संस्था हैं। इन संस्थाओं का कार्यसंचालन विश्व की सभी ऐसी संस्थाओं के लिए अनुकरणीय होना चाहिए। संसद को चाहिए कि (1) स्वयं अपनी 120 दिन या कम ज्यादा बैठकों को सुनिश्चित करने के लिए संविधान संशोधन करे। (2) विधानमंडलों की सुनिश्चित बैठकों के लिए संविधान में संशोधन किया जाए। (3) विधेयकों के पारित होने के लिए निर्धारित समय की चर्चा का प्रावधान किया जाए। (4) बजट प्रस्तावों के लिए भी बहस का सुनिश्चित समय हो और उसे संवैधानिक बाध्यता बनाया जाए। (5) नियमों में संशोधन करते हुए प्रश्नोत्तर काल को बाद में और शून्यकाल को सुबह करने से प्रश्नोत्तरों का समय हंगामे और शोर-शराबे की भेंट नहीं चढ़ेगा। (6) मंत्री स्तरीय भ्रष्टाचार के मामले की जांच के लिए उच्चाधिकार प्राप्त स्थाई संयुक्त संसदीय समिति की व्यवस्था की जाए। भारत के करोड़ों नवयुवक निराश हैं। राजनीति के नियामक क्रांति की पदचाप सुनें। (लेखक उप्र विधानपरिषद के सदस्य हैं)

1 comment:

  1. इस नए सुंदर से चिट्ठे के साथ आपका हिंदी ब्‍लॉग जगत में स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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