सांसद निधि में हुई ढाई गुना बढ़ोत्तरी के बाद अब इसके दायरे में भी व्यापक बढ़ोत्तरी की कवायद शुरू हो गई है। जरूरत हुई तो दिशानिर्देश में क्षेत्र विशेष के लिहाज से भी परिवर्तन हो सकते हैं। यानी उत्तर पूर्व के पहाड़ी इलाकों के सांसदों को स्थानीय समस्याओं से जूझने के लिए छूट दी जा सकती है तो मैदानी व तटीय इलाकों के सांसदों के लिए कार्य के कुछ दूसरे क्षेत्र खोले जा सकते हैं। केंद्रीय सांख्यिकी व कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्री एमएस गिल का कहना है कि जनता से आने वाले तार्किक सुझावों को वह दिशानिर्देश में शामिल करने के लिए तैयार हैं। सांसद निधि में सालाना दो करोड़ रुपये की जगह अब सांसदों को पांच करोड़ मिलेंगे। लिहाजा केंद्र सरकार पर अब लगभग चार हजार करोड़ रुपये का बोझ होगा। ऐसे में गिल अब जहां निगरानी को चुस्त-दुरुस्त करना चाहते हैं, वहीं इसके तहत होने वाले कार्यो का क्षेत्र भी बढ़ाना चाहते हैं। पिछले कुछ दिनों में अशक्तों के लिए व्हील चेयर, बीमारों के लिए एंबुलेंस, मोबाइल लाइब्रेरी जैसे कार्यो को अनुमति देने के बाद अब वह कार्यक्षेत्रों की पहचान में जुटे हैं। दैनिक जागरण से बातचीत में उन्होंने कहा कि अलग-अलग क्षेत्रों की समस्याओं और जरूरतों को देखते हुए कुछ नए कार्यो को भी इसमें जोड़ा जा सकता है। जबकि कार्य की प्रगति को देखते हुए कुछ योजनाओं में खर्च की सीमा बढ़ाई जा सकती है। गिल अशक्तों की मदद को लेकर खासे उत्साहित हैं। फिलहाल इस मद में 10 लाख रुपये की सीमा तय की गई है। संभव है कि आने वाले दिन में इसे बढ़ा दिया जाए। बहरहाल निगरानी पर तेज नजर होगी। गिल ने बताया कि वह जल्द ही सभी 600 जिलों में सांसद निधि से होने वाले कार्यो का सर्वे करवाकर इसकी तह तक जाएंगे। यह सर्वे नाबार्ड की एजेंसी नैबकॉन करेगी। सांख्यिकी मंत्रालय के जरिए सभी मंत्रालयों पर नजर रख रहे गिल की सरकार की फ्लैगशिप योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी नजर है। लिहाजा अगर सरकार मानती है तो उनका मंत्रालय मनरेगा, एनआरएचएम, सर्व शिक्षा अभियान, समेकित बाल विकास जैसी आठ योजनाओं की समीक्षा करने के लिए तैयार है।
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