Friday, May 6, 2011

संसदीय व्यवस्था के दुर्दिन


लेखक सत्तापक्ष पर बहुमत की आड़ में लोक लेखा समिति का निरादर करने का आरोप लगा रहे हैं
बहुमत सत्य का निर्णायक नहीं होता। संसदीय लोकतंत्र बहुमत की तानाशाही नहीं होता। बहुमत सरकार चलाता है। विपक्ष निगरानी करता है, गलतियां निकालता है, सुझाव देता है। राजकोष मंत्रिपरिषद की निजी दौलत नहीं, लोकधन होता है। लोकसभा इसे मदवार खर्च करने की अनुमति देती है। संविधान के निर्देशानुसार नियंत्रक महालेखापरीक्षक लोक लेखा की जांच करता है, राय देता है। लोक लेखा की व्यापक जांच लोकसभा के लिए व्यावहारिक नहीं होती। इसी जांच और अन्य अनुषंगी कार्यो के लिए लोकसभा की लोक लेखा समिति है। समिति जांचती है कि स्वीकृत धनराशि कानूनी रूप से विहित प्रयोजन से भिन्न तो नहीं व्यय हुई। इसीलिए भारत की संसदीय संस्थाओं में इसकी खास भूमिका है। लोक लेखा समिति 1921 से ही काम कर रही है। स्वतंत्र भारत में तीसरी लोकसभा तक इस समिति का अध्यक्ष सत्तादल का था, लेकिन 1967 से अब तक अध्यक्ष विरोधी दल से ही निर्वाचित होते रहे हैं। समिति के इतिहास में बहुमत के जरिए सत्य का गला घोंटने की कोई घटना नहीं हुई, लेकिन दूरसंचार घोटाले की जांच में सत्ता दल और उसके कथित सहयोगी दलों ने समिति की गरिमा को तहस-नहस कर दिया है। संसदीय बहसों के शोर शराबे को लेकर राष्ट्र पहले से ही आहत था, अब संसदीय समिति में भी अप्रिय हरकतें हैं। भ्रष्टाचार की हरेक घटना की उपेक्षा कांग्रेस की सोची-समझी रणनीति है। कांग्रेस जेपीसी को टालने के लिए पीएसी जांच को महत्वपूर्ण बता रही थी, लेकिन जेपीसी को बेकार बताने वाली कांग्रेस ने पीएसी की जांच को बेकार और जेपीसी को महत्वपूर्ण बताने का अभियान चलाया। विवाद लोकसभाध्यक्ष तक पहुंचा। लोकसभाध्यक्ष ने दोनों समितियों की जांच जारी रखने को नियमसंगत ठहराया। प्रधानमंत्री भी पीएसी में साक्ष्य देने को तैयार थे, लेकिन इसी पीएसी ने प्रधानमंत्री के सचिव को बुलाया तो पूरी कांग्रेस नाखुश हो गई। सीबीआइ के निदेशक, एटार्नी जनरल व विधि सचिव को भी उपस्थित होने के नोटिस गए थे। साक्ष्य के लिए बुलाना समिति का विशेषाधिकार भी है। आखिरकार अध्यक्ष डॉ. जोशी ने कहां पक्षपात किया? समिति ने साक्षियों को बुलाने का निर्णय लेकर क्या गलती की? यह स्थापित परिपाटी है। समिति ने 4 अप्रैल की बैठक में ही अप्रैल के आखिर तक समूची कार्यवाही पूरी कर लेने का निश्चय किया था। लोकसभा सचिवालय ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर रिपोर्ट तैयार की। रिपोर्ट सदस्यों में वितरित थी। इसी रिपोर्ट पर विचार होना था। डॉ. जोशी रिपोर्ट पर बहस चाहते थे, लेकिन सत्तापक्ष ने तर्क-प्रतितर्क के बजाय बहुमत की हुल्लड़बाजी का सिद्धांत चलाया। कांग्रेस के रणनीतिकार रंगे हाथ पकड़े गए। जेपीसी पीएसी का विकल्प नहीं है। जेपीसी का गठन विशेष उद्देश्य से संदर्भित विषयों को लेकर होता है। पीएसी लोकसभा की स्थाई समिति है। कांग्रेस और अवसरवादी सपा, बसपा ने राज्यसभा के एक सदस्य को पीएसी का सभापति चुनने की दयनीय नौटंकी भी की। बुनियादी सवाल यह है कि बहुमत में होने के बावजूद उन्होंने साक्ष्यों पर आधारित रिपोर्ट के विभिन्न प्रस्तरों पर नियमानुसार प्रश्न, तर्क और प्रतितर्क क्यों नहीं किए? उन्होंने प्रधानमंत्री और अन्य मंत्रियों से जुड़े समिति के निष्कर्षों को संशोधित करने की नियमानुसार मांग करने के बजाय शोरशराबे का रास्ता ही क्यों चुना? आशंका है कि उन्होंने समिति की रिपोर्ट लीक की। संसद की समिति प्रणाली बहुत महत्वपूर्ण है। लोकसभा सचिवालय द्वारा प्रकाशित संसदीय पद्धति और प्रक्रिया में कहा गया है कि संसदीय समिति प्रणाली उन विशिष्ट या तकनीकी स्वरूप वाले विषयों को निपटाने में बहुत लाभदायक सिद्ध होती है जो सभा के बजाय कुछ सदस्यों द्वारा गहन विचार करके अधिक अच्छी तरह से निपटाए जा सकते हैं। संसदीय बहसों में राजनीतिक गर्मी होती है, लेकिन समिति-बैठकों के आत्मीय वातावरण में गहन विश्लेषण की सुविधा होती है। कांग्रेसजन ऐसा नहीं मानते। टू जी स्पेक्ट्रम के सवाल पर कांग्रेस प्रारंभ से ही झूठ बोल रही है। प्रधानमंत्री का झूठ पकड़ा गया। नए संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने सारी करतूतों को भ्रष्टाचार ही नहीं माना तो भी ए. राजा जेल गए। लोक लेखा समिति अपने प्राधिकार में मामले की तह तक गई। कांग्रेस ने पूरी समिति को ही बदनाम करने की रणनीति बनाई। सभापति मुरली मनोहर जोशी की निष्पक्षता को चुनौती दी गई। संसदीय परिपाटी में सभाध्यक्ष/सभापति के सम्मान व विनिश्चय को चुनौती नहीं दी जाती, लेकिन कांग्रेस ने डॉ. जोशी पर घटिया आरोप लगाए। वित्तीय अनुशासनहीनता और फिजूलखर्ची आदि पर लोक लेखा समिति ने पहले भी सुझाव दिए हैं और कान खिंचाई भी की है। पहली लोकसभा की समिति ने 7वां, 17वां, 22वां व दूसरी लोकसभा का 17वां प्रतिवेदन केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री ने जरूर पढ़ा होगा। समिति ने सीएजी के लेखा परीक्षणों में उठाए गए विषयों के अलावा स्वयं अपनी ओर से भी जांच की है। 1953-54 में समिति ने एक कंपनी से कृषि औजारों के क्रय और उपयोग की जांच की थी, समिति ने केंद्र सरकार द्वारा महानदी पुल के मामले की जांच के लिए नियुक्त विभागीय समिति के प्रतिवेदन पर भी विचार किया था। 1958-59 में समिति ने दो उपकर निधियों-कोयला खान श्रमिक सुरक्षा व संरक्षण निधि और कोयला खान श्रमिक आवास निधि के कामकाज की भी जांच की थी। समिति ने काम के बदले अनाज, सिंचाई परियोजनाओं का निगरानी तंत्र, सूखा कार्यक्रम, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना आदि महत्वपूर्ण विषयों पर सातवीं व आठवीं लोकसभा के दौरान लोकोपयोगी प्रतिवेदन दिए हैं। संचार घोटाला नियंत्रक महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट से ही जुड़ा था। आखिरकार मार्च अप्रैल 2011 में नई बात क्या हो गई? जाहिर है कि प्रधानमंत्री से जुड़ी टिप्पणी कांग्रेसी बर्दाश्त के बाहर थी। प्रधानमंत्री संसद से बड़ा नहीं होता। उसके कार्यालय या उसके कामकाज पर टिप्पणी करना संसदीय विशेषाधिकार और कर्तव्य भी है। कांग्रेस संसदीय संस्थाओं को आदर नहीं देती। कांग्रेस ने 1975-77 के दौरान संसदीय संस्थाओं को तहस नहस किया, इमरजेंसी आई, राष्ट्र भिड़ गया, लेकिन उसकी सोच में बदलाव नहीं आया। संसद में नोट के बदले वोट का सिद्धांत कांग्रेस लाई। संसद की प्रतिष्ठा गिरी। लोक लेखा समिति में कांग्रेस ने ही सारी संसदीय मर्यादाएं तार-तार कीं। अब जेपीसी की बारी है। सत्ता पक्ष जेपीसी को भी अपना काम नहीं करने देगा। संसदीय व्यवस्था के दुर्दिन हैं। लोकसभाध्यक्ष को लोक लेखा समिति में हुए हुडदंग का और सभास्थगन के बाद किए गए प्रहसन का संज्ञान लेना चाहिए। राष्ट्र के समक्ष संसदीय संस्थाएं बचाने की चुनौती है। (लेखक उप्र विधानपरिषद के सदस्य हैं)


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