सत्तापक्ष के रवैये को संसदीय लोकतंत्र और उसकी गरिमा पर आघात मान रहे हैं लेखक
कांग्रेस की आपत्ति के बावजूद भाजपा ने जिस तरह मुरली मनोहर जोशी का नाम लोक लेखा समिति के अध्यक्ष के रूप में प्रस्तावित किया और लोकसभा अध्यक्ष ने इस पर मुहर भी लगा दी उससे आने वाले दिनों में समिति के कामकाज में हंगामा होने के आसार फिर से बढ़ गए हैं। 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला मामले की जांच कर रही लोक लेखा समिति की रिपोर्ट को लेकर संसद भवन के भीतर जो कुछ हुआ वह न केवल दुर्भाग्यपूर्ण और अभूतपूर्व है, बल्कि संसदीय लोकतंत्र और उसकी गरिमा पर कुठाराघात करने की एक सुनियोजित कोशिश भी है। भारत के संसदीय इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जबकि लोक लेखा समिति के अध्यक्ष को उनकी अनुपस्थिति में उनसे असहमति रखने वाले सदस्यों ने मनमाने तरीके से हटाने का फैसला तक कर डाला, जो कि नितांत असंवैधानिक, अनुचित और गैर कानूनी कृत्य की श्रेणी में आता है। यह सदन और समिति दोनों की ही अवमानना का मामला है। संसदीय समितियों में शामिल सदस्यों से अपेक्षा की जाती है कि वे व्यक्तिगत राजनीतिक हितों और अपने दलगत स्वार्थो से ऊपर उठकर तटस्थ रहते हुए देशहित में काम करेंगे और असहमति के प्रश्न को संसदीय नियमों और प्रक्रियाओं के दायरे में रहकर सुलझाएंगे। अभी तक परंपरा भी यही रही है। लोक लेखा समिति का यह संवैधानिक दायित्व है कि यह संस्था लोक धन के दुरुपयोग के मामलों अथवा देश को धोखा देने वाले लोगों की पूरी जांच करे और स्पीकर को समिति के निष्कर्षो से अवगत कराए, लेकिन समिति के निष्कर्ष स्पीकर तक पहंुचने से पहले ही जिस तरह मामले को राजनीतिक रंग देने और रिपोर्ट को रोकने की साजिश रची गई वह अपने आप में अनोखी घटना है। साफ है कि भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी सरकार खुद के बचाव के लिए ऐसे कदम जानबूझकर उठा रही है ताकि जनता का ध्यान बांटा जा सके और उसे कुछ राहत मिले, पर सरकार भूल रही है कि ऐसे कारनामों से उसका वास्तविक चेहरा और अधिक बेनकाब हुआ है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब बैठक को अध्यक्ष ने स्थगित कर दिया था तो उस समय बैठक का अस्तित्व ही कहां रहा और तब किसी भी तरह के निर्णय लेने का प्रश्न ही नहीं उठता। यदि इस परंपरा को स्वीकार कर लिया जाता है और कल को कुछ सांसद मिलकर सदन की अनुपस्थिति में प्रधानमंत्री के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दें तो क्या इसे स्वीकार कर लिया जाएगा? इसी से जुड़ा एक प्रश्न यह भी है कि सैफुद्दीन सोज को सदस्यों ने मुरली मनोहर जोशी की जगह मनमाने तरीके से अध्यक्ष चुना, लेकिन वह इस नियम को भूल गए कि सैफुद्दीन सोज राज्यसभा के सदस्य हैं, जो तकनीकी रूप से लोक लेखा समिति यानी पीएसी के अध्यक्ष बन ही नहीं सकते और अध्यक्ष को नियुक्त करने का अधिकार समिति के सदस्यों को कतई नहीं दिया गया है। यदि संपूर्णता में विचार किया जाए तो यह मामला काफी गंभीर है, जो न केवल अशोभनीय घटना है, बल्कि विशेषाधिकारों के हनन और सदन की अवमानना का मामला भी है। यह सही है कि लोकतंत्र में हर किसी को अपनी बात कहने और दूसरों से असहमति रखने का पूरा अधिकार है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जब सत्ता पक्ष पर नकेल कसने लगे तो अपने किसी खास एजेंडे और स्वार्थ को पूरा करने के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं पर ही प्रहार करना शुरू कर दिया जाए। संप्रग-2 सरकार में यह कोई पहला मामला नहीं है जब लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को चोट पहुंचाई गई। इससे पहले जब कैग ने टूजी स्पेक्ट्रम में घोटाले का खुलासा किया था तो भी सरकार की ओर से कुछ ऐसा ही किया गया था कि जैसे कैग ने कोई अपराध कर दिया हो। यह तो सुप्रीम कोर्ट का दखल था कि सरकार को मामले की जांच के लिए तैयार होना पड़ा और जब सच सामने आने लगा तो सरकार ने ऐसी चालें चलनी शुरू कर दीं जो उसे एक बार फिर से संदेह के घेरे में खड़ा करती हैं। जिन लोगों ने लोक लेखा समिति अध्यक्ष पर मनमानी करने का आरोप लगाया है उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि बैठक बंद कमरे में कैमरे के सामने होती है और इसकी पूरी रिकॉर्डिग होती है। इसलिए समिति के कुछ सदस्यों का यह आरोप निराधार है कि डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने उनकी बातों को अनसुना करते हुए एकतरफा रिपोर्ट तैयार की। लोक लेखा समिति की रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है इसलिए केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर उस पर उंगली उठाना बाकी राजनीतिक दलों के लिए भी तर्कसंगत नहीं होगा। कहा जा रहा है कि समिति की जांच में प्रधानमंत्री कार्यालय और तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम की भूमिका संदिग्ध पाए जाने के कारण सत्ता पक्ष के सदस्यों में खलबली थी जिस कारण कांग्रेस और द्रमुक ने मिलकर यह मुहिम चलाई और सपा व बसपा को भी अपने साथ लिया। यही नहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सरकार में मंत्री कपिल सिब्बल ने मोर्चा संभाला और लोक लेखा समिति के अध्यक्ष पर व्यक्तिगत हमला बोलते हुए सार्वजनिक तौर पर कह दिया कि यह जोशी की रिपोर्ट नहीं, बल्कि दोषी रिपोर्ट है, जिसे बाहरी लोगों की मदद से तैयार कराया गया है। ऐसी ही टिप्पणियां कांग्रेस के कुछ अन्य नेताओं ने भी कीं, लेकिन कपिल सिब्बल द्वारा डॉ. जोशी पर की गई टिप्पणी बेहद गंभीर है, जो स्पष्ट तौर पर सदन की अवमानना और संसदीय विशेषाधिकार के हनन का मामला बनता है। कपिल सिब्बल ने जब यह बयान दिया तो क्या उन्हें नहीं मालूम था कि वह एक गैर संसदीय और गैर संवैधानिक कार्य कर रहे हैं? एक बार एक संपादक ने भी कुछ ऐसा ही आचरण किया था। तब उन्होंने कृपलानी की आलोचना करते हुए कृपालिनी शब्द का प्रयोग किया। इसके लिए तत्कालीन सदन ने न केवल उनकी भर्त्सना की थी, बल्कि उन्हें सदन में बुलाकर डांट लगाई और उनसे माफी मंगवाई गई। यहां भूला नहीं जा सकता कि कपिल सिब्बल ने कैग की आलोचना भी कुछ इसी अंदाज में की थी, जिसके लिए उन्हें काफी आलोचना झेलनी पड़ी। इस तरह के बयानों से यही जाहिर होता है कि सरकार को न तो संसद की चिंता है और न लोकतांत्रिक संस्थाओं के गरिमा की। वह मनमाने तरीके से अपनी शर्तो पर काम करना चाहती है और उंगली उठाने वाली संस्थाओं को गलत साबित करना चाहती है। संभवत: यही वह सोच और दृष्टि है जो लोक लेखा समिति के अध्यक्ष को हटाने और उसे जायज ठहराने की कोशिश के रूप में दिखी। इस तरह के गैर संसदीय आचरण से संसदीय संस्कृति, व्यवहार और परंपरा को नष्ट करने की कोशिश हो रही है। (लेखक संवैधानिक मामलों के जानकार हैं).
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