Thursday, May 19, 2011
Friday, May 6, 2011
सांप्रदायिकता के विरुद्ध नया विधेयक
सांप्रदायिक हिंसा निवारक विधेयक का नया मसविदा हमारे सामने है। 2004 में जब संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सत्ता में आया, तो उसने अपने साझा न्यूनतम कार्यक्रम में सांप्रदायिक हिंसा से निपटने के लिए विशेष कानून बनाने का वादा किया था। लेकिन पिछले सात सालों में बात मसविदों से आगे नहीं बढ़ी है। जब सरकार ने इस कानून का अपना मसविदा पेश किया तो उस पर कई हलकों से एतराज उठे थे। एतराज उठाने में सिविल सोसायटी के धर्मनिरपेक्ष हिस्से के वे संगठन भी थे, जो लंबे समय से ऐसे कानून की मांग करते रहे हैं। उनकी मुख्य आपत्ति इस बात को लेकर थी कि प्रस्तावित कानून के जरिए प्रशासन को और ताकत देने की बात कही जा रही थी, जबकि उन संगठनों की राय में जरूरत प्रशासन को जवाबदेह बनाने की है। एक राय यह भी उभरी कि प्रस्तावित कानून के प्रावधान देश के संघीय ढांचे का उल्लंघन करने वाले हैं। गौरतलब है कि कानून-व्यवस्था राज्यों के अधिकार क्षेत्र का विषय है और इस तरह दंगों से निपटने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकार की ही होती है। अगर प्रस्तावित कानून के तहत किसी इलाके को ‘दंगा प्रभावित क्षेत्र’ घोषित कर वहां सीधे दखल देने का अधिकार केंद्र को मिल जाए तो इस पर राज्यों एवं खासकर क्षेत्रीय दलों को आपत्ति होना स्वाभाविक है। प्रस्तावित कानून की एक और आलोचना यह भी रही है कि उसमें सिर्फ सांप्रदायिक दंगों को ध्यान में रखा गया है, जबकि जातीय, भाषाई और अन्य कमजोर तबकों पर होने वाली हिंसा को पर्याप्त महत्त्व नहीं दिया गया है। अब सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) ने कानून के नए प्रारूप में इन आलोचनाओं का समाधान ढूंढने की कोशिश की है। गृह और विधि मंत्रालयों को भेजे जा रहे प्रारूप का नाम- सांप्रदायिक एवं लक्ष्य केंद्रित हिंसा निवारण (न्याय प्राप्ति एवं क्षतिपूर्ति) विधेयक, 2011 रखा गया है। जाहिर है, अब विधेयक का दायरा ज्यादा बड़ा है। मसविदे में जिस राष्ट्रीय प्राधिकार की स्थापना का सुझाव दिया गया है, उसके बारे में अब सफाई दी गई है कि यह संस्था न तो कानून लागू करने वाली मौजूदा मशीनरी के ऊपर होगी और न ही वर्तमान प्रशासनिक एवं न्यायिक तंत्र की शक्ति छीनेगी। बल्कि सिर्फ ‘सलाह’ देने वाली संस्था होगी, लेकिन यह सलाह ‘जवाबदेही’ के संदर्भ में होगी। मसलन, अगर कोई राज्य सरकार इस संस्था की सलाह को नजरअंदाज कर देती है और उसके परिणास्वरूप बड़े पैमाने पर हिंसा या जन संहार घटित हो जाता है, तो वह ‘सलाह’ ऐसा ठोस दस्तावेज होगा, जिसके आधार पर अदालत में कर्त्तव्य निभाने में लापरवाही या जानबूझ कर कोताही का मुकदमा चलाया जा सकेगा। यानी प्रस्तावित संस्था के पास प्रशासन को सीधे आदेश देने का अधिकार तो नहीं होगा, लेकिन उसे एक ऐसी व्यवस्था के रूप में स्थापित किया जाएगा, जिसके परामर्श को राज्य सरकारें या प्रशासन गंभीरता से लें और ऐसा न करने पर उसके परिणाम भुगतने को तैयार रहें। दरअसल, राष्ट्रीय प्राधिकार प्रस्तावित कानून का केंद्रीय पहलू है। उसमें सात सदस्य रखे जाने का सुझाव दिया गया है, जिनका चयन प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता, गृहमंत्री और लोकसभा में सभी राष्ट्रीय दलों के नेताओं की समिति करेगी। सुझाव दिया गया है कि समिति में अनिवार्य रूप से चार सदस्य अल्पसंख्यक समुदायों से और एक महिला हो। एनएसी के प्रारूप में सिविल सोसायटी के संगठनों की यह राय झलकती है कि सरकारी मशीनरी के अधिकार और बढ़ाने की जरूरत नहीं है, बल्कि आवश्यकता यह सुनिश्चित करने की है कि जो अधिकार उसे मिले हुए हैं, सांप्रदायिक या अन्य लक्ष्य केंद्रित दंगों के समय प्रशासन उन अधिकारों का ठीक ढंग से इस्तेमाल करे। गौरतलब है कि सांप्रदायिक दंगों या जन संहार से निपटने के लिए एक खास कानून हो, इसकी जरूरत गुजरात दंगों के बाद ज्यादा शिद्दत से महसूस की गई थी। उसके साथ 1983 के नेल्ली जन संहार, 1984 के सिख विरोधी दंगों, 1992-93 के मुंबई दंगों आदि का भी अनुभव था। इनमें से कोई दंगा इसलिए नहीं हुआ कि प्रशासन के पास उन्हें रोकने की ताकत या अधिकार नहीं थे। बल्कि वे राजनीतिक ताकतों की सक्रिय भागीदारी, उनके प्रभाव में प्रशासन द्वारा कर्त्तव्य निभाने में लापरवाही या कहीं-कहीं प्रशासन की मिलीभगत से हुए। इसलिए यह उचित एवं स्वाभाविक ही है कि अगर ऐसा कोई कानून बन रहा है, तो उसमें प्रशासन की जवाबदेही तय करने पर मुख्य ध्यान दिया जाए। इस लिहाज से एनएसी के प्रारूप के कुछ सुझाव महत्त्वपूर्ण हैं। मसलन, दंगा होते ही पुलिस प्रमुख सभी टेलीकॉम सेवा प्रदाता कंपनियों को उस इलाके में टेलीफोन कॉल से संबंधित तमाम दस्तावेजों को सुरक्षित रखने के लिए अधिसूचना जारी करें। सभी सरकारी एवं निजी अस्पतालों को तमाम मेडिकल रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के लिए अधिसूचित किया जाए। पुलिस विभाग पुलिस कंट्रोल रूम एवं इलाके के सभी थानों में केस डायरी, स्टेशन डायरी और जांच एवं अदालती कार्यवाही से संबंधित अन्य सभी दस्तावेज सुरक्षित रखना अनिवार्य हो। उपरोक्त तमाम दस्तावेजों की जरूरत गुजरात में चली अदालती कार्यवाही के दौरान महसूस की गई थी। दूसरा अहम सुझाव यह है कि प्रस्तावित कानून के तहत अफसरों पर मुकदमा चलाने के लिए सरकार से अनुमति लेने का प्रावधान अनिवार्य रूप से लागू नहीं होगा। केंद्र या राज्य सरकारों को मुकदमा चलाने की अर्जी पर 30 दिनों के अंदर फैसला लेना होगा। अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो माना जाएगा कि उन्होंने मुकदमा चलाने की इजाजत दे दी है। अगर उन्होंने यह अर्जी ठुकराई तो उन्हें इसका कारण बताना होगा। अगर कोर्ट उन कारणों से संतुष्ट नहीं हुआ, तो मुकदमा चलाने के सवाल पर खुद फैसला करने में वह सक्षम होगा। प्रश्न है कि क्या यह प्रारूप सिविल सोसायटी को संतुष्ट करने में सक्षम है? क्या इस पर राजनीतिक सहमति बनेगी और क्या यह केंद्र सरकार को मंजूर होगा? जहां तक सांप्रदायिक या जातीय दंगों का सवाल है, कानून उनसे निपटने का सिर्फ एक पक्ष है। दूसरा पक्ष वह राजनीति विकसित करना है, जो ऐसे सामाजिक-सांस्कृतिक विभाजनों पर खड़ी न हो, बल्कि आम जन के रोजी-रोटी के मुद्दों पर केंद्रित हो। अब न सिर्फ भारत, बल्कि दुनिया भर में अध्ययनों से साबित हो चुका है कि दंगे राजनीतिक गोलबंदी एवं समर्थन जुटाने का माध्यम होते हैं। ऐसी मिसालें बेहद कम होंगी, जब ये प्रशासनिक विफलता का परिणाम रहे हों। यह ठीक है कि कानूनी अवरोध एवं संतुलन की व्यवस्था एक सही दिशा में कदम है, लेकिन आने वाले समय में इस बहस को इस कदम से आगे ले जाने और दंगों के राजनीतिक स्वरूप को समझने की जरूरत बनी रहेगी। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
संसदीय व्यवस्था के दुर्दिन
लेखक सत्तापक्ष पर बहुमत की आड़ में लोक लेखा समिति का निरादर करने का आरोप लगा रहे हैं…
बहुमत सत्य का निर्णायक नहीं होता। संसदीय लोकतंत्र बहुमत की तानाशाही नहीं होता। बहुमत सरकार चलाता है। विपक्ष निगरानी करता है, गलतियां निकालता है, सुझाव देता है। राजकोष मंत्रिपरिषद की निजी दौलत नहीं, लोकधन होता है। लोकसभा इसे मदवार खर्च करने की अनुमति देती है। संविधान के निर्देशानुसार नियंत्रक महालेखापरीक्षक लोक लेखा की जांच करता है, राय देता है। लोक लेखा की व्यापक जांच लोकसभा के लिए व्यावहारिक नहीं होती। इसी जांच और अन्य अनुषंगी कार्यो के लिए लोकसभा की लोक लेखा समिति है। समिति जांचती है कि स्वीकृत धनराशि कानूनी रूप से विहित प्रयोजन से भिन्न तो नहीं व्यय हुई। इसीलिए भारत की संसदीय संस्थाओं में इसकी खास भूमिका है। लोक लेखा समिति 1921 से ही काम कर रही है। स्वतंत्र भारत में तीसरी लोकसभा तक इस समिति का अध्यक्ष सत्तादल का था, लेकिन 1967 से अब तक अध्यक्ष विरोधी दल से ही निर्वाचित होते रहे हैं। समिति के इतिहास में बहुमत के जरिए सत्य का गला घोंटने की कोई घटना नहीं हुई, लेकिन दूरसंचार घोटाले की जांच में सत्ता दल और उसके कथित सहयोगी दलों ने समिति की गरिमा को तहस-नहस कर दिया है। संसदीय बहसों के शोर शराबे को लेकर राष्ट्र पहले से ही आहत था, अब संसदीय समिति में भी अप्रिय हरकतें हैं। भ्रष्टाचार की हरेक घटना की उपेक्षा कांग्रेस की सोची-समझी रणनीति है। कांग्रेस जेपीसी को टालने के लिए पीएसी जांच को महत्वपूर्ण बता रही थी, लेकिन जेपीसी को बेकार बताने वाली कांग्रेस ने पीएसी की जांच को बेकार और जेपीसी को महत्वपूर्ण बताने का अभियान चलाया। विवाद लोकसभाध्यक्ष तक पहुंचा। लोकसभाध्यक्ष ने दोनों समितियों की जांच जारी रखने को नियमसंगत ठहराया। प्रधानमंत्री भी पीएसी में साक्ष्य देने को तैयार थे, लेकिन इसी पीएसी ने प्रधानमंत्री के सचिव को बुलाया तो पूरी कांग्रेस नाखुश हो गई। सीबीआइ के निदेशक, एटार्नी जनरल व विधि सचिव को भी उपस्थित होने के नोटिस गए थे। साक्ष्य के लिए बुलाना समिति का विशेषाधिकार भी है। आखिरकार अध्यक्ष डॉ. जोशी ने कहां पक्षपात किया? समिति ने साक्षियों को बुलाने का निर्णय लेकर क्या गलती की? यह स्थापित परिपाटी है। समिति ने 4 अप्रैल की बैठक में ही अप्रैल के आखिर तक समूची कार्यवाही पूरी कर लेने का निश्चय किया था। लोकसभा सचिवालय ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर रिपोर्ट तैयार की। रिपोर्ट सदस्यों में वितरित थी। इसी रिपोर्ट पर विचार होना था। डॉ. जोशी रिपोर्ट पर बहस चाहते थे, लेकिन सत्तापक्ष ने तर्क-प्रतितर्क के बजाय बहुमत की हुल्लड़बाजी का सिद्धांत चलाया। कांग्रेस के रणनीतिकार रंगे हाथ पकड़े गए। जेपीसी पीएसी का विकल्प नहीं है। जेपीसी का गठन विशेष उद्देश्य से संदर्भित विषयों को लेकर होता है। पीएसी लोकसभा की स्थाई समिति है। कांग्रेस और अवसरवादी सपा, बसपा ने राज्यसभा के एक सदस्य को पीएसी का सभापति चुनने की दयनीय नौटंकी भी की। बुनियादी सवाल यह है कि बहुमत में होने के बावजूद उन्होंने साक्ष्यों पर आधारित रिपोर्ट के विभिन्न प्रस्तरों पर नियमानुसार प्रश्न, तर्क और प्रतितर्क क्यों नहीं किए? उन्होंने प्रधानमंत्री और अन्य मंत्रियों से जुड़े समिति के निष्कर्षों को संशोधित करने की नियमानुसार मांग करने के बजाय शोरशराबे का रास्ता ही क्यों चुना? आशंका है कि उन्होंने समिति की रिपोर्ट लीक की। संसद की समिति प्रणाली बहुत महत्वपूर्ण है। लोकसभा सचिवालय द्वारा प्रकाशित संसदीय पद्धति और प्रक्रिया में कहा गया है कि संसदीय समिति प्रणाली उन विशिष्ट या तकनीकी स्वरूप वाले विषयों को निपटाने में बहुत लाभदायक सिद्ध होती है जो सभा के बजाय कुछ सदस्यों द्वारा गहन विचार करके अधिक अच्छी तरह से निपटाए जा सकते हैं। संसदीय बहसों में राजनीतिक गर्मी होती है, लेकिन समिति-बैठकों के आत्मीय वातावरण में गहन विश्लेषण की सुविधा होती है। कांग्रेसजन ऐसा नहीं मानते। टू जी स्पेक्ट्रम के सवाल पर कांग्रेस प्रारंभ से ही झूठ बोल रही है। प्रधानमंत्री का झूठ पकड़ा गया। नए संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने सारी करतूतों को भ्रष्टाचार ही नहीं माना तो भी ए. राजा जेल गए। लोक लेखा समिति अपने प्राधिकार में मामले की तह तक गई। कांग्रेस ने पूरी समिति को ही बदनाम करने की रणनीति बनाई। सभापति मुरली मनोहर जोशी की निष्पक्षता को चुनौती दी गई। संसदीय परिपाटी में सभाध्यक्ष/सभापति के सम्मान व विनिश्चय को चुनौती नहीं दी जाती, लेकिन कांग्रेस ने डॉ. जोशी पर घटिया आरोप लगाए। वित्तीय अनुशासनहीनता और फिजूलखर्ची आदि पर लोक लेखा समिति ने पहले भी सुझाव दिए हैं और कान खिंचाई भी की है। पहली लोकसभा की समिति ने 7वां, 17वां, 22वां व दूसरी लोकसभा का 17वां प्रतिवेदन केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री ने जरूर पढ़ा होगा। समिति ने सीएजी के लेखा परीक्षणों में उठाए गए विषयों के अलावा स्वयं अपनी ओर से भी जांच की है। 1953-54 में समिति ने एक कंपनी से कृषि औजारों के क्रय और उपयोग की जांच की थी, समिति ने केंद्र सरकार द्वारा महानदी पुल के मामले की जांच के लिए नियुक्त विभागीय समिति के प्रतिवेदन पर भी विचार किया था। 1958-59 में समिति ने दो उपकर निधियों-कोयला खान श्रमिक सुरक्षा व संरक्षण निधि और कोयला खान श्रमिक आवास निधि के कामकाज की भी जांच की थी। समिति ने काम के बदले अनाज, सिंचाई परियोजनाओं का निगरानी तंत्र, सूखा कार्यक्रम, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना आदि महत्वपूर्ण विषयों पर सातवीं व आठवीं लोकसभा के दौरान लोकोपयोगी प्रतिवेदन दिए हैं। संचार घोटाला नियंत्रक महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट से ही जुड़ा था। आखिरकार मार्च अप्रैल 2011 में नई बात क्या हो गई? जाहिर है कि प्रधानमंत्री से जुड़ी टिप्पणी कांग्रेसी बर्दाश्त के बाहर थी। प्रधानमंत्री संसद से बड़ा नहीं होता। उसके कार्यालय या उसके कामकाज पर टिप्पणी करना संसदीय विशेषाधिकार और कर्तव्य भी है। कांग्रेस संसदीय संस्थाओं को आदर नहीं देती। कांग्रेस ने 1975-77 के दौरान संसदीय संस्थाओं को तहस नहस किया, इमरजेंसी आई, राष्ट्र भिड़ गया, लेकिन उसकी सोच में बदलाव नहीं आया। संसद में नोट के बदले वोट का सिद्धांत कांग्रेस लाई। संसद की प्रतिष्ठा गिरी। लोक लेखा समिति में कांग्रेस ने ही सारी संसदीय मर्यादाएं तार-तार कीं। अब जेपीसी की बारी है। सत्ता पक्ष जेपीसी को भी अपना काम नहीं करने देगा। संसदीय व्यवस्था के दुर्दिन हैं। लोकसभाध्यक्ष को लोक लेखा समिति में हुए हुडदंग का और सभास्थगन के बाद किए गए प्रहसन का संज्ञान लेना चाहिए। राष्ट्र के समक्ष संसदीय संस्थाएं बचाने की चुनौती है। (लेखक उप्र विधानपरिषद के सदस्य हैं)
Thursday, May 5, 2011
संसदीय सम्मान पर आघात
सत्तापक्ष के रवैये को संसदीय लोकतंत्र और उसकी गरिमा पर आघात मान रहे हैं लेखक
कांग्रेस की आपत्ति के बावजूद भाजपा ने जिस तरह मुरली मनोहर जोशी का नाम लोक लेखा समिति के अध्यक्ष के रूप में प्रस्तावित किया और लोकसभा अध्यक्ष ने इस पर मुहर भी लगा दी उससे आने वाले दिनों में समिति के कामकाज में हंगामा होने के आसार फिर से बढ़ गए हैं। 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला मामले की जांच कर रही लोक लेखा समिति की रिपोर्ट को लेकर संसद भवन के भीतर जो कुछ हुआ वह न केवल दुर्भाग्यपूर्ण और अभूतपूर्व है, बल्कि संसदीय लोकतंत्र और उसकी गरिमा पर कुठाराघात करने की एक सुनियोजित कोशिश भी है। भारत के संसदीय इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जबकि लोक लेखा समिति के अध्यक्ष को उनकी अनुपस्थिति में उनसे असहमति रखने वाले सदस्यों ने मनमाने तरीके से हटाने का फैसला तक कर डाला, जो कि नितांत असंवैधानिक, अनुचित और गैर कानूनी कृत्य की श्रेणी में आता है। यह सदन और समिति दोनों की ही अवमानना का मामला है। संसदीय समितियों में शामिल सदस्यों से अपेक्षा की जाती है कि वे व्यक्तिगत राजनीतिक हितों और अपने दलगत स्वार्थो से ऊपर उठकर तटस्थ रहते हुए देशहित में काम करेंगे और असहमति के प्रश्न को संसदीय नियमों और प्रक्रियाओं के दायरे में रहकर सुलझाएंगे। अभी तक परंपरा भी यही रही है। लोक लेखा समिति का यह संवैधानिक दायित्व है कि यह संस्था लोक धन के दुरुपयोग के मामलों अथवा देश को धोखा देने वाले लोगों की पूरी जांच करे और स्पीकर को समिति के निष्कर्षो से अवगत कराए, लेकिन समिति के निष्कर्ष स्पीकर तक पहंुचने से पहले ही जिस तरह मामले को राजनीतिक रंग देने और रिपोर्ट को रोकने की साजिश रची गई वह अपने आप में अनोखी घटना है। साफ है कि भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी सरकार खुद के बचाव के लिए ऐसे कदम जानबूझकर उठा रही है ताकि जनता का ध्यान बांटा जा सके और उसे कुछ राहत मिले, पर सरकार भूल रही है कि ऐसे कारनामों से उसका वास्तविक चेहरा और अधिक बेनकाब हुआ है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब बैठक को अध्यक्ष ने स्थगित कर दिया था तो उस समय बैठक का अस्तित्व ही कहां रहा और तब किसी भी तरह के निर्णय लेने का प्रश्न ही नहीं उठता। यदि इस परंपरा को स्वीकार कर लिया जाता है और कल को कुछ सांसद मिलकर सदन की अनुपस्थिति में प्रधानमंत्री के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दें तो क्या इसे स्वीकार कर लिया जाएगा? इसी से जुड़ा एक प्रश्न यह भी है कि सैफुद्दीन सोज को सदस्यों ने मुरली मनोहर जोशी की जगह मनमाने तरीके से अध्यक्ष चुना, लेकिन वह इस नियम को भूल गए कि सैफुद्दीन सोज राज्यसभा के सदस्य हैं, जो तकनीकी रूप से लोक लेखा समिति यानी पीएसी के अध्यक्ष बन ही नहीं सकते और अध्यक्ष को नियुक्त करने का अधिकार समिति के सदस्यों को कतई नहीं दिया गया है। यदि संपूर्णता में विचार किया जाए तो यह मामला काफी गंभीर है, जो न केवल अशोभनीय घटना है, बल्कि विशेषाधिकारों के हनन और सदन की अवमानना का मामला भी है। यह सही है कि लोकतंत्र में हर किसी को अपनी बात कहने और दूसरों से असहमति रखने का पूरा अधिकार है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जब सत्ता पक्ष पर नकेल कसने लगे तो अपने किसी खास एजेंडे और स्वार्थ को पूरा करने के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं पर ही प्रहार करना शुरू कर दिया जाए। संप्रग-2 सरकार में यह कोई पहला मामला नहीं है जब लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को चोट पहुंचाई गई। इससे पहले जब कैग ने टूजी स्पेक्ट्रम में घोटाले का खुलासा किया था तो भी सरकार की ओर से कुछ ऐसा ही किया गया था कि जैसे कैग ने कोई अपराध कर दिया हो। यह तो सुप्रीम कोर्ट का दखल था कि सरकार को मामले की जांच के लिए तैयार होना पड़ा और जब सच सामने आने लगा तो सरकार ने ऐसी चालें चलनी शुरू कर दीं जो उसे एक बार फिर से संदेह के घेरे में खड़ा करती हैं। जिन लोगों ने लोक लेखा समिति अध्यक्ष पर मनमानी करने का आरोप लगाया है उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि बैठक बंद कमरे में कैमरे के सामने होती है और इसकी पूरी रिकॉर्डिग होती है। इसलिए समिति के कुछ सदस्यों का यह आरोप निराधार है कि डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने उनकी बातों को अनसुना करते हुए एकतरफा रिपोर्ट तैयार की। लोक लेखा समिति की रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है इसलिए केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर उस पर उंगली उठाना बाकी राजनीतिक दलों के लिए भी तर्कसंगत नहीं होगा। कहा जा रहा है कि समिति की जांच में प्रधानमंत्री कार्यालय और तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम की भूमिका संदिग्ध पाए जाने के कारण सत्ता पक्ष के सदस्यों में खलबली थी जिस कारण कांग्रेस और द्रमुक ने मिलकर यह मुहिम चलाई और सपा व बसपा को भी अपने साथ लिया। यही नहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सरकार में मंत्री कपिल सिब्बल ने मोर्चा संभाला और लोक लेखा समिति के अध्यक्ष पर व्यक्तिगत हमला बोलते हुए सार्वजनिक तौर पर कह दिया कि यह जोशी की रिपोर्ट नहीं, बल्कि दोषी रिपोर्ट है, जिसे बाहरी लोगों की मदद से तैयार कराया गया है। ऐसी ही टिप्पणियां कांग्रेस के कुछ अन्य नेताओं ने भी कीं, लेकिन कपिल सिब्बल द्वारा डॉ. जोशी पर की गई टिप्पणी बेहद गंभीर है, जो स्पष्ट तौर पर सदन की अवमानना और संसदीय विशेषाधिकार के हनन का मामला बनता है। कपिल सिब्बल ने जब यह बयान दिया तो क्या उन्हें नहीं मालूम था कि वह एक गैर संसदीय और गैर संवैधानिक कार्य कर रहे हैं? एक बार एक संपादक ने भी कुछ ऐसा ही आचरण किया था। तब उन्होंने कृपलानी की आलोचना करते हुए कृपालिनी शब्द का प्रयोग किया। इसके लिए तत्कालीन सदन ने न केवल उनकी भर्त्सना की थी, बल्कि उन्हें सदन में बुलाकर डांट लगाई और उनसे माफी मंगवाई गई। यहां भूला नहीं जा सकता कि कपिल सिब्बल ने कैग की आलोचना भी कुछ इसी अंदाज में की थी, जिसके लिए उन्हें काफी आलोचना झेलनी पड़ी। इस तरह के बयानों से यही जाहिर होता है कि सरकार को न तो संसद की चिंता है और न लोकतांत्रिक संस्थाओं के गरिमा की। वह मनमाने तरीके से अपनी शर्तो पर काम करना चाहती है और उंगली उठाने वाली संस्थाओं को गलत साबित करना चाहती है। संभवत: यही वह सोच और दृष्टि है जो लोक लेखा समिति के अध्यक्ष को हटाने और उसे जायज ठहराने की कोशिश के रूप में दिखी। इस तरह के गैर संसदीय आचरण से संसदीय संस्कृति, व्यवहार और परंपरा को नष्ट करने की कोशिश हो रही है। (लेखक संवैधानिक मामलों के जानकार हैं).
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